रविवार, 22 अगस्त 2010

मैं बिहार हूँ... दुनिया की अदालत में हाजिर -नाजिर....( Mai Bihar hun ..duniya ki adalat mein hajir -najir..) मैं बिहार हूँ /! जहाँ सबसे अधिक बौद्ध 'विहार' बने / जिस जमीन के हर हिस्से पर बुद्ध के कदमों की छाप है/ जहाँ बुद्ध ने सर्वाधिक चातुर्मास बिताये/ जहाँ से सदियों पुरानी न्याय प्रणाली ने एक नया मोड़ लिया कि मारनेवाले से ज्यादा अधिकार बचाने वाले का होता है ; (शिकारी देवदत्त को रक्षक सिध्दार्थ को घायल हंस लौटा देना पड़ा) / यही से न्याय और अहिंसा क उपदेश पूरी दुनिया में फैला !

 मैं बिहार हूँ !
जहाँ सबसे अधिक बौद्ध 'विहार' बने
जिस जमीन के हर हिस्से पर बुद्ध के कदमों की छाप है
जहाँ बुद्ध ने सर्वाधिक चातुर्मास बिताये
जहाँ से सदियों पुरानी न्याय प्रणाली ने एक नया मोड़ लिया कि मारनेवाले से ज्यादा अधिकार बचाने वाले का होता है ;
(शिकारी देवदत्त को रक्षक सिध्दार्थ को घायल हंस लौटा देना पड़ा)
यही से न्याय और अहिंसा क उपदेश पूरी दुनिया में फैला !

मैं बिहार हूँ !
जहाँ सभ्यता की शुरूआत में श्रीराम महर्षि विश्वमित्र से विद्या लेने आये
जहाँ महर्षि विश्वमित्र के नेतृत्व में धरती पर पहला शोध- संस्थान स्थापित हुआ
जहाँ रावण का साम्राज्य सबसे पहले विस्थापित हुआ ( पूतना महाज्ञानी, महाराजा, महाबली,महाकवि  दुष्ट रावण की जिला कलेक्टर थी )
जहाँ से नालंदा विश्वविद्यालय सदियों तक संसार में रोशनी क प्रसार करता रहा !

मैं बिहार हूँ ... करूणा की स्त्रोतस्विनी !
मेरी एक बेटी सीता है जो रावण की लंका में तबतक दुःख सहती रही जबतक राम के सैनिक सबकी मुक्ति के लिए नहीं आ गए.
मेरी एक बेटी सुजाता थी जिसने उपवासी सिध्दार्थ को खीर खिलाया ;मध्यम मार्ग सुझाया:
 (वीणा के तारों को इतना मत खीचो की तार टूट जाएँ ; इतना ढीला भी मत छोडो की बजे ही नहीं !)
मेरी एक बेटी भारती महापंडित मंडन मिश्र की संगिनी थी
जिसने शंकराचार्य के शास्त्रार्थ के घमंड को तोड़ा था , उन्हें कल्याण - पथ पर मोड़ा था !
(मेरे पति को परास्त कर आप आधा ही जीते है श्रीमान ! यही उसने कहा था  )

मैं बिहार हूँ !
प्रेम और भाईचारे का तरफदार!
इतिहास के गहरे अंधकार में मैंने ही पहली बार पौरुष को जाति-पांति से ऊपर स्थपित किया था
वीरत को सम्मानित किया था / अरे! मैंने ही तो अज्ञात कुलशील धीवर सुत कर्ण को अपना 'अंग'(राज्य) दिया था
गुण - कौशल को ताज पहनाया था / मैंने ही सबसे पहले इन्सान की कद्र की और संसार के  इतिहस  में पहली बार आम आदमी को राज्य का भागीदार बनाया / प्रजातंत्र का फॉर्मूला दिया; वैशाली गणराज्य बनाया !

मैं बिहार हूँ जिसने  महावीर को पारसनाथ की पहाड़ियों में जन्म दिया
जहाँ सिक्खों के अंतिम गुरु गोविन्द सिंह जी पैदा हुये
मैं शेरशाह सूरी की भी माँ हूँ जिसके राज्य में घरों में ताला नहीं लगता था
जहाँ महात्मा गाँधी के विचारों के रूप में अहिंसा और रामराज्य ने एकसाथ पुनर्जन्म लिया

..................
मेरा एक बेटा  कुंवर सिंह था जिसने फिरंगियों का रंग उड़ा दिया :

मैं बिहार हूँ जहाँ से जयप्रकाश नारायण ने सम्पूर्ण क्रांति का आह्वान किया और
फिरंगी मानसिकता को जड़ से हिला दिया !

मैं बिहार हूँ जहाँ तीनों मौसम आते है;
जहाँ अब हर मौसम में शामिल रहता है पतझड़ !
मैं बिहार हूँ - फसलों के काटे जाने के बाद की उदास धरती !
मुझे अपने बेटों के चौड़े कन्धों और मजबूत इरादों का इंतजार है ; वे लौटें और मेरी गोद हरी बना दें !

मुझे धरती की सबसे सुंदर परी बना दें !

बुधवार, 18 अगस्त 2010

सुनने वालों ने  ग़ज़ल  कहने कि अदा दी है
ये तो अनुगूँज  है, जिस गूँज ने सदा दी है .

सोमवार, 16 अगस्त 2010

.एक पटकविता.... झोपड़पट्टियाँ....

  पटकविता
   एक्ट वन , एक्सटेरियर, मॉर्निंग
   झोपड़पट्टियाँ.....
सुबह -सुबह शराब पीकर एक औरत दुनिया की बादशाहत  कर रही है / सूरज की आंच में ये बस्ती चिता की तरह दहक रही है/
इस आग में आग है , पानी है, मछलियाँ हैं / मुर्ग- मुस्सलम है / मटन है, कबाब है, शबाब है / नमस्ते है, प्रणाम है, वणक्कम है, आदाब है / यहाँ भी जिंदाबाद है / जिन्दगी आबाद है / जिन्दगी की सभी आजादियाँ यहाँ सस्ते में मिलती हैं / आसपास की अट्टालिकाएँ सुबह की धूप में बच्चों की तरह खेल रही हैं / और यहाँ जिन्दगी सबसे बड़ा हादसा झेल रही है -- फिर से सुबह हो गई है और एक और दिन सूरज के नीचे बिताना है ......
 पटकविता 
एक्ट टू, एक्सटेरियर,मिड डे
 झोपड़पट्टियाँ...
तपते फुटपाथ पर जो लेटे है ; वे  भी भारत के बेटे हैं / माँ बैठी है बगल में पानी लेकर / गोदने की बिंदिया बता रही है की वह किसी आदिवासी गाँव से उखाड़कर आ गिरी है इस झोपड़पट्टी में ...यहाँ भी उसे अभी तिरपाल भर जगह नहीं मिली है/ आठ नौ महीने का स्वस्थ गदराया आदिवासी बच्चा बेसुध सोया है नाले के ऊपर के फुटपाथ  पर / माँ के पास / ईंटों के चूल्हे पर खाना भी बन रहा है / एक बालक बची आंच पर मूंगफलियाँ भून  रहा है / औरतें नहा रही हैं सूरज के तेजाबी किरणों के शॉवर में / कुर्ती- पेटीकोट के बाहर समूचा जिस्म सांवला हो गया है ...ऐसा लग रहा है कि पैदाइश से ही ये एक लम्बी चिता में जलाये जा रहे हैं / एक जवान होती हुई लड़की आईने में अपना रूप संवार रही है / आईना जैसे सूरज हो गया है / अपने सहने की ताक़त से ,जलने की जुर्रत से उस लड़की की चमड़ी आईने को मरहम दे रही है / जिसे सूरज अपनी चौंध से फोड़ डालना चाहता है / अगल -बगल उसके दो किशोर साथी बैठे हैं / लड़की ने पसीने और धूल से झोल बने बालों को पुरानी रूमाल से कस लिया है / ये लो वह तैयार हो गई और तीनों  फुटपाथ पर बैठी माँ से उसका हाल  पूछने आये हैं / मैं भी वहीँ खड़ा हूँ / यह देश आजाद नहीं हुआ है इस बात पर अड़ा हूँ .......


पटकविता 
एक्ट थ्री , एक्सटेरियर, इविनिंग

                                                                   झोपड़पट्टियाँ.....

आपने कभी यहाँ शाम को उतरते देखा है ? /जब दिन भर की धूप और धूल धोकर बालों में फूल सजाये जाते हैं / तवे पर तवे भर की रोटियाँ बनती हैं/बोटियाँ छनती हैं /बोतलें खुलतीं हैं / बच्चे खेलते हैं / गजरे वाले बालों के चेहरे की चमड़ी में दमड़ी भर का पाउडर माला जाता है / कालिख को सफेदी से छला जाता है /एक दूसरा बाजार सजता है / हर तार बजता है /मैं उस बाजार में एक आवारा दर्शक की तरह घुसता हूँ /अनजान पते पूछता हूँ /...नशे में धुत्त एक बूढ़े को नौजवानों ने धुन दिया है /आतंक ने यहाँ भी अपना जाला बुन दिया है / पिंजरे में गाती रंगीन चिड़िया और चौखट पर बैठी बुढ़िया को कोई डर नहीं है......ईश्वर आसमान में क्यों टंगा है ? / उस बेचारे के पास भी तो घर नहीं है !/ ऐसा घर जहाँ वह खुश रह सके /जहाँ कोई किसी को नुकसान न पहुंचाए / जिन्दगी की धज्जियाँ न उड़ाये........

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

Indian Cinema..Persian comment....

The star director of Persia Majid Majidi say to Vishwas kulkarni in an interview (Mumbai mirror, June18,2010) that why can not indian make films of international stature?
Majid Majidi--Indian Cinema is in a very sad situation.They have not been able to come up with the standards to be accepted by the world.They are not using their faculties, economic or cultural.there are potentially good actors here.Indians have a wide viewer base. Indian cinema has access to lots of money. I am therefore saddened that the outcome is zero.An industry produces 600 films should produce at least 40-50 films of inter national standards at least.But clearlythis is not the case.

What you say? Its a invitation for discussion.